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बदलते बस्तर की मिसाल: रावघाट पहुंची ट्रेन, पूर्व नक्सलियों ने किया पहला सफर

May 20, 2026 Source: Bharat Pulse Media

बदलते बस्तर की मिसाल: रावघाट पहुंची ट्रेन, पूर्व नक्सलियों ने किया पहला सफर

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छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से बुधवार को ऐसी दो तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने बदलते बस्तर की नई कहानी को एक साथ बयां किया। एक ओर वर्षों से अधूरी पड़ी रावघाट रेल परियोजना आखिरकार अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच गई, तो दूसरी ओर कभी विकास परियोजनाओं का विरोध करने वाले आत्मसमर्पित पूर्व नक्सली पहली बार रेल यात्रा करते नजर आए। इन दोनों घटनाओं ने बस्तर में आ रहे बदलाव, विश्वास और विकास की नई दिशा को स्पष्ट कर दिया है। करीब 21 साल पहले शुरू हुई रावघाट रेल परियोजना का अंतिम ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा हुआ। पहली बार ताडोकी से रावघाट तक ट्रेन का ट्रायल रन किया गया। रावघाट इस परियोजना का अंतिम स्टेशन माना जा रहा है। यह परियोजना लंबे समय तक नक्सलवाद, सुरक्षा चुनौतियों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण प्रभावित रही। कई बार निर्माण कार्य बाधित हुआ और इस दौरान सुरक्षाबलों के जवानों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। बावजूद इसके, लगातार प्रयासों के बाद आज रेल इंजन अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया। इसी दिन भानुप्रतापपुर से दूसरी भावुक तस्वीर भी सामने आई। यहां जिला पुलिस द्वारा आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व नक्सलियों को रेल दिखाने और यात्रा कराने की पहल की गई। रेल में बैठकर सफर करते समय उनके चेहरों पर उत्साह, खुशी और आश्चर्य साफ दिखाई दिया। जिन इलाकों में कभी नक्सल गतिविधियों के डर से ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित होती थी, वहीं आज पूर्व नक्सली खुद रेल यात्रा का आनंद लेते नजर आए। एक समय ऐसा था जब बस्तर में रेल परियोजनाएं नक्सलियों के निशाने पर रहती थीं। जगदलपुर-बैलाडीला रेल मार्ग पर कई बार नक्सली घटनाओं के कारण सेवाएं प्रभावित हुईं। विकास कार्यों का विरोध आम बात थी, लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। जो लोग कभी बंदूक के रास्ते पर थे, वे अब मुख्यधारा में लौटकर विकास की नई पटरी पर आगे बढ़ रहे हैं। भानुप्रतापपुर और रावघाट से सामने आई ये तस्वीरें सिर्फ खबर नहीं, बल्कि बदलते बस्तर की पहचान बन चुकी हैं। एक तरफ 21 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद विकास की जीत दिखाई दे रही है, तो दूसरी तरफ हिंसा छोड़ चुके लोगों के समाज से जुड़ने का सकारात्मक संदेश भी सामने आया है। अब बस्तर में डर और बंदूक की आवाज से ज्यादा विकास और बदलाव की रफ्तार सुनाई देने लगी है।