Wednesday, November 4, 2026
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Chhattisgarh

राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम

November 4, 2026 Source: Bharat Pulse Media

राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम
राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम
राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम
राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम
राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम
राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में लोककला और बॉलीवुड संगीत का अनूठा संगम

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रायपुर, 03 नवंबर 2026/ छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 के अंतिम दिन नवा रायपुर का राज्योत्सव मेला मैदान लोकसंस्कृति, संगीत और कला के अनुपम संगम का साक्षी बना। एक ओर छत्तीसगढ़ी माटी की सोंधी महक से सराबोर लोकगीतों की मधुर धुनें थीं, तो दूसरी ओर बॉलीवुड के सदाबहार गीतों की गूंज। पंडवानी की लोकगाथाओं से लेकर पंथी नृत्य की ऊर्जा, कथक की कलात्मकता और सूफी संगीत की रूहानियत तक, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने राज्योत्सव की अंतिम संध्या को यादगार बना दिया। राज्योत्सव के अंतिम दिन प्रसिद्ध बॉलीवुड पार्श्व गायक अभिजीत भट्टाचार्य, छत्तीसगढ़ी गायक सुनील सोनी और लोक कलाकार उषा बारले की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। वहीं शिल्प ग्राम मंच पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की लोककला और भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की विविध विधाओं का प्रदर्शन किया। *बॉलीवुड पार्श्व गायक अभिजीत के सदाबहार नगमों से सजी सुरमयी शाम* राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में बॉलीवुड के प्रसिद्ध पार्श्व गायक अभिजीत ने अपनी सुरीली आवाज से हिंदी फिल्म संगीत का जादू बिखेरा। उनके लोकप्रिय गीतों ने संध्या को बॉलीवुड के सदाबहार नगमों के रंग में रंग दिया। अभिजीत ने 'चांद तारे'। जैसे लोकप्रिय गीत प्रस्तुत किए। इसके साथ ही 'बादशाह ओ बादशाह' गीत ने कार्यक्रम में उत्साह का रंग घोला। उन्होंने 'बहुत खूबसूरत हो....' और 'वादा रहा सनम....' जैसे रोमांटिक गीतों से संगीतप्रेमियों की शाम यादगार बनाई। *सुनील सोनी के गीतों में गूंजी छत्तीसगढ़ की माटी, मया और महतारी की महिमा* छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के लोकप्रिय गायक सुनील सोनी ने अपनी सुमधुर आवाज और मनमोहक गीतों से राज्योत्सव की सांस्कृतिक संध्या को छत्तीसगढ़ी रंगों में रंग दिया। उनके गीतों में प्रदेश की माटी से लगाव, मां के प्रति सम्मान, प्रेम और आत्मीयता की भावनाएं झलकती रहीं। सुनील सोनी ने 'छैंया भुइंया ला छोड़ तैं.....' गीत से छत्तीसगढ़ की धरती से जुड़े भावों को स्वर दिया। वहीं 'झन भूलौ मां-बाप ला....' जैसे भावपूर्ण गीतों के माध्यम से माता-पिता के त्याग, ममता और उनके प्रति सम्मान का संदेश दिया। इसके बाद 'मीठ-मीठ लागे मया के बानी.....' और छत्तीसगढ़ी फिल्म हांडा के लोकप्रिय गीत 'ए गोरी ओ गोरी....' की प्रस्तुति से सांस्कृतिक संध्या में प्रेम और उल्लास के रंग घुल गए। *उषा बारले की पंडवानी प्रस्तुति में जीवंत हुई छत्तीसगढ़ की लोकगाथा परंपरा* राज्योत्सव के अंतिम दिन सुप्रसिद्ध लोक कलाकार उषा बारले ने पंडवानी की प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककथात्मक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को मंच पर जीवंत किया। *शिल्प ग्राम मंच पर दिखे भारतीय संस्कृति और छत्तीसगढ़ी लोककलाओं के विविध रंग* राज्योत्सव के अंतिम दिन शिल्प ग्राम मंच भी सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहा। यहां भजन गायन से लेकर पंथी नृत्य, लोकमंच, जसगीत-जगराता, आदिवासी लोक संगीत, कथक, सूफी संगीत और नाटक सहित कुल 10 सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया। रायपुर की सुश्री आस्था भट्ट ने भजन गायन से कार्यक्रम में भक्तिमय वातावरण का संचार किया। दुर्ग की श्रीमती आरती बारले और रायपुर के श्री दिनेश कुमार जांगड़े के दलों ने पंथी नृत्य प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनृत्य परंपरा की झलक दिखाई। कबीरधाम के श्री राकेश सेन के नेतृत्व में लोकमंच की प्रस्तुति हुई। रायपुर की सुश्री पूर्णिमा साहू ने जसगीत-जगराता भजन के माध्यम से छत्तीसगढ़ की देवी आराधना और भक्ति परंपरा को स्वर दिया। श्री अभिषेक सोनकर के दल ने आदिवासी लोक संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति देकर जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को मंच पर उतारा। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मनोहारी छटा भी शिल्प ग्राम मंच पर देखने को मिली। श्रीमती दीपाली पाण्डेय के दल ने कथक समूह नृत्य तथा सुश्री अनुष्णा रॉय चौधरी ने कथक नृत्य प्रस्तुत किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य की लय, ताल और भाव-भंगिमाओं की सुंदर अभिव्यक्ति हुई। श्री वृधुमन वचस्पति भारती ने सूफी संगीत की प्रस्तुति दी, जबकि श्री आनंदकुमार पाण्डेय के दल ने नाटक के माध्यम से रंगमंचीय कला का प्रदर्शन किया।