Wednesday, November 4, 2026
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Chhattisgarh

राज्योत्सव 2026 में बस्तर की ढोकरा कला बनी आकर्षण का प्रमुख केंद्र

November 4, 2026 Source: Bharat Pulse Media

राज्योत्सव 2026 में बस्तर की ढोकरा कला बनी आकर्षण का प्रमुख केंद्र
राज्योत्सव 2026 में बस्तर की ढोकरा कला बनी आकर्षण का प्रमुख केंद्र

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रायपुर, 03 नवंबर 2026/ छत्तीसगढ़ की पहचान केवल यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य, लोकगीत और लोकनृत्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की पारंपरिक हस्तकलाएं भी प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती हैं। ऐसी ही एक अनूठी विरासत है बस्तर की ढोकरा कला, जिसमें कलाकार अपने हुनर और रचनात्मकता से लकड़ी और धातु को आकर्षक कलाकृतियों का रूप देते हैं। राज्योत्सव में कोण्डागांव जिले के ग्राम करणपुर से पहुंचे कलाकारों द्वारा तैयार की गई ये कलाकृतियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। बस्तर की पारंपरिक गढ़वा कला से जुड़े ये कलाकार पीढ़ियों से चली आ रही शिल्पकला को अपने हाथों से जीवंत कर रहे हैं। इनके स्टॉल पर आदिवासी जनजीवन, पारंपरिक रीति-रिवाज, देवी-देवताओं और लोकआस्था से जुड़ी अनेक कलाकृतियां देखने को मिल रही हैं। खास बात यह है कि इन कलाकृतियों को बनाने में मशीनों के बजाय कलाकारों के हाथों की मेहनत, अनुभव और पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। *झिटकू-मिटकी की प्रेमगाथा से लेकर देवी प्रतिमाओं तक* स्टॉल पर रखी कलाकृतियों में झिटकू-मिटकी की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। बस्तर की लोककथा और प्रेमगाथा से जुड़ी झिटकू-मिटकी की कलाकृति यहां की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है। इसके साथ ही आदिवासी जीवनशैली, पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और ग्रामीण परिवेश को प्रदर्शित आकृतियां भी बनाई गई हैं। देवी माता की प्रतिमाएं भी कलाकारों के हुनर और आस्था का सुंदर उदाहरण हैं। लकड़ी और धातु से तैयार की गई इन कलाकृतियों में बस्तर के जनजीवन की झलक दिखाई देती है। हर आकृति के पीछे कलाकार की कल्पना, मेहनत और संस्कृति के प्रति उसका जुड़ाव नजर आता है। *हाथों की कारीगरी में निहित पीढ़ियों की विरासत* ढोकरा कला छत्तीसगढ़ की पारंपरिक धातु शिल्पकलाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। गढ़वा समुदाय के पारंपरिक शिल्पकार धातु को आकार देकर ऐसी कलाकृतियां तैयार करते हैं, जिनमें बारीक नक्काशी और पारंपरिक डिजाइन की विशेष पहचान होती है। मोम की ढलाई जैसी पारंपरिक तकनीक से तैयार होने वाली ढोकरा कलाकृतियां अपनी विशिष्ट बनावट के कारण अलग पहचान रखती हैं। आज के आधुनिक दौर में जहां बाजार में मशीनों से बनी सजावटी वस्तुओं की भरमार है, वहीं इन कलाकारों की हाथ से तैयार की गई कलाकृतियां अपनी मौलिकता और पारंपरिक स्वरूप के कारण खास महत्व रखती हैं। *राज्योत्सव से कलाकारों को मिला मार्केट* ग्राम करणपुर से आए कलाकार राज्योत्सव में अपनी कलाकृतियां बिक्री के लिए लेकर पहुंचे हैं। यहाँ प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले लोग इन हस्तनिर्मित वस्तुओं को देख रहे हैं और अपनी पसंद के अनुसार खरीदारी भी कर रहे हैं। कलाकारों के लिए राज्योत्सव केवल सामान बेचने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी कला और पारंपरिक पहचान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का एक माध्यम भी है। कलाकृतियों की खरीदारी से कलाकारों को आर्थिक सहयोग मिलता है और उनके पारंपरिक हुनर को आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी मिलती है। शासन द्वारा कारीगरों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उनके उत्पादों को मार्केट दिलाने की दिशा में निरंतर कार्य किया जा रहा है।