Saturday, July 4, 2026
English edition

India

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को मिला मौलिक अधिकार का दर्जा ...

June 2, 2026 Source: Bharat Pulse Media

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को मिला मौलिक अधिकार का दर्जा ...

Share this article

नई दिल्ली। डिजिटल युग में व्यक्तिगत गोपनीयता और सम्मान की रक्षा को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (भूल जाने का अधिकार) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और डिजिटल गोपनीयता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति **सचिन दत्ता** ने कहा कि इंटरनेट पर मौजूद जानकारी अक्सर लंबे समय तक उपलब्ध रहती है और कई बार लगभग स्थायी रूप ले लेती है। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के अतीत से जुड़ी घटनाएं, भले ही वे अब अप्रासंगिक हो चुकी हों, उसकी वर्तमान जिंदगी, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सम्मान को प्रभावित कर सकती हैं। अदालत ने माना कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद पुरानी जानकारी व्यक्ति के निजी जीवन पर लगातार असर डाल सकती है। याचिकाकर्ताओं में ऐसे लोग शामिल थे जिन्हें आपराधिक मामलों में अदालत द्वारा बरी किया जा चुका था। इसके अलावा कुछ लोग वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों के पक्षकार थे, जबकि कुछ व्यक्तियों का नाम केवल औपचारिक रूप से मुकदमों में दर्ज हुआ था। इन सभी ने अदालत को बताया कि गूगल सर्च और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पुराने मामलों की जानकारी उपलब्ध रहने के कारण उन्हें रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी व्यक्ति से संबंधित पुरानी या अप्रासंगिक जानकारी उसकी गरिमा और निजता को नुकसान पहुंचा रही है, तो उसे इंटरनेट से हटाने या सर्च परिणामों में छिपाने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों के कानूनी निष्कर्ष और तर्क सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बने रहेंगे। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह संतुलन भी स्थापित किया कि जहां एक ओर लोगों को निजता का अधिकार प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक सूचना तक पहुंच का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। इसलिए आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति की पहचान संबंधी विवरणों को हटाया जा सकता है, लेकिन मूल न्यायिक रिकॉर्ड सुरक्षित रहेंगे और अदालतों तथा अधिकृत एजेंसियों के लिए उपलब्ध रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में डिजिटल निजता से जुड़े कानूनों और अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। साथ ही यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक बनेगा, जहां व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सार्वजनिक सूचना के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता होगी।